हल्द्वानी। उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के खत्याड़ी गांव निवासी लोक गायक दीवान सिंह कनवाल का बुधवार तड़के निधन हो गया। उनके निधन से कुमाउँनी लोक संगीत से जुड़े लोगों और इलाके में शोक की लहर फैल गई है।
बताया जा रहा है कि कनवाल ने अपने घर में ही अंतिम सांस ली और उनकी अंत्येष्टि अल्मोड़ा के बेतालेश्वर घाट में की जाएगी। उन्होंने अपने लोक संगीत के करियर की शुरुआत ‘मेघा आ’ फिल्म में गाना गाकर की थी। इसके बाद उन्होंने अपने इस सफर में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अल्मोड़ा कोऑपरेटिव बैंक में सीनियर ब्रांच मैनेजर रहे कनवाल ने ज्यादातर खुद के लिखे हुए गीतों को ही कम्पोज कर गाया था। वह रामलीला में भी कई भूमिकाओं में नजर आते थे। जानकारों की मानें तो कनवाल ने कुमाउँनी लोकसंगीत को 100 से ज्यादा गाने दिए हैं।
जानकार बताते हैं कि कनवाल 1984 में दिल्ली गए थे और मोहन उप्रेती के थिएटर ग्रुप पृथ्वी लोक कला केंद्र से जुड़ गए थे। इस दौरान उन्होंने उप्रेती से थिएटर की बारीकियां सीखने के साथ ही लोक नाटकों के मंचन की बारीकियां भी सीखीं। खबरों के मुताबिक, इस दरमियान दिल्ली में रहने-खाने के लिए उन्हें कई छोटे-मोटे काम भी करने पड़े। बकौल रिपोर्ट्स, कुछ दिन उन्हें रसना भी बेचना पड़ा।
हिमालय लोक कला केंद्र के संस्थापक रहे कनवाल की कई एल्बम चर्चाओं में रही हैं। उनकी एल्बम सुवा, थात बात, हुड़ुकी घमा घम, नंदा चालीसा, पैलाग, जय मय्या बाराही और सुफल हई जय पंचनाम देव को लेकर लोगों में काफी क्रेज रहा। उन्होंने ‘ओ दाज्यू मेरी घर वाली रिसेगे…’, ‘दो दिनों का ड्यारा यो दुनि में…’, ‘त्यार म्यार पहाड़’, ‘आज कुछे मत जा’ समेत कई अन्य सुपरहिट गीत दिए थे। उन्होंने मेघा आ, जय हिंद, बलि वेदना, आपण बिराण, ऐ गे बहार, जय गोलू देव समेत कई फिल्मों में बतौर प्ले बैक सिंगर काम किया था।
उन्होंने कई नाटकों का निर्देशन भी किया था। जानकारों के मुताबिक, उन्होंने कलबिष्ट, हरु हीत, गंगनाथ, सूरज कुंवर जोत माला, अजुआ बफौल समेत कई नाटकों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन आदि नाटकों का निर्देशन किया था।
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