पाठक उवाच

प्रिय भावना! (भावना के नाम एक आम नागरिक का खत)

प्रिय भावना!

कैसी भावना हो तुम! जो एक “कॉमेडियन” के दिए व्यंग्यात्मक बयान पर तो भड़क जाती हो मगर राम मंदिर में हुए घपले पर नहीं भड़कती, तब तुम्हारे मुंह में दही जम जाता है। कैसी भावना हो तुम! जिन्हें विधायकों की खरीद-फरोख्त और चुनाव के दौरान बहती शराब की नदियां नजर नहीं आतीं, मगर आम जनता के छोटे-छोटे सवालों पर तुम अपना आपा खो देती हो।

कैसी भावना हो तुम! जो मीडिया की गिरती हुई वैश्विक रैंकिंग और निष्पक्षता पर सवाल उठाने वाले आंकड़ों को नजरअंदाज कर देती हो, मगर प्रोपेगेंडा फैलाने वाली खबरों को तुम सच मानकर उन पर शोर मचाने लगती हो। कैसी भावना हो तुम! जो छोटे-मोटे अतिक्रमण पर तो बुलडोजर की पैरवी करती हो, मगर बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा पारिस्थितिक तंत्र को नष्ट किए जाने पर तुम्हारी आवाज दबी रह जाती है।

कैसी भावना हो तुम! जो किसी को ‘देशभक्त’ साबित करने के लिए उसके खान-पान तक पर सवाल खड़ा कर देती हो, मगर देश के खजाने को लूटकर विदेश भागने वाले आर्थिक अपराधियों पर तुम चुप रहती हो। कैसी भावना हो तुम! जो हिंदू राष्ट्र की बात तो करती हो, मगर तुम्हें वे अवसर नजर नहीं आते जहाँ अलग जाति का होने के कारण किसी को आत्महत्या करनी पड़ती है, और समाज में उन्हें सम्मानजनक ढंग से रहने के लिए कमरे तक किराए पर नहीं मिलते।

कैसी भावना हो तुम! जो देश की विविधता का गुणगान करते नहीं थकती, मगर अपनी विचारधारा से अलग सोचने वाले हर वर्ग को मुख्यधारा से बाहर निकालने की साजिश रचती हो। कैसी भावना हो तुम! जो फिल्म की स्क्रिप्ट में महिला पात्र के चित्रण पर तो भड़क जाती हो, मगर जमीनी स्तर पर महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों के आंकड़ों को देखकर तुम नजरें फेर लेती हो।

कैसी भावना हो तुम! जिन्हें नीट की परीक्षा के दौरान आत्महत्या किए बच्चे नजर नहीं आते मगर लव जिहाद के मामले नजर आ जाते हैं। कैसी भावना हो तुम! जो भर्ती परीक्षाओं में हुई धांधली पर युवाओं के आंसुओं को नहीं देख पाती, मगर चुनावी रैलियों में भीड़ देखकर तुम्हारे अंदर का जोश उमड़ पड़ता है। कैसी भावना हो तुम! जिन्हें महंगे कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन तो शिक्षा की उन्नति लगते हैं, मगर गरीब तबके के बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों में घटती सुविधाओं पर तुम गूंगी हो जाती हो।

कैसी भावना हो तुम! जो पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में गर्भवती महिलाओं की मौत को नहीं देख पातीं, मगर शहरों के चकाचौंध भरे आयोजनों में तुम सराबोर हो जाती हो। कैसी भावना हो तुम! जो वीआईपी संस्कृति के तहत अस्पतालों में वीआईपी इलाज को तो सही मान लेती हो, मगर सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ते मरीजों पर तुम्हारी संवेदनाएं सो जाती हैं।

कैसी भावना हो तुम! जो मंदिरों में ‘वीआईपी दर्शन’ के नाम पर आम भक्त की उपेक्षा और पैसे के दम पर ईश्वर तक पहुँचने के खेल को नहीं देख पातीं, मगर धर्म के नाम पर शोर मचाने में तुम सबसे आगे रहती हो। कैसी भावना हो तुम! जो विकास की इन भव्य परियोजनाओं के शिलान्यास और उद्घाटन पर तो जयकारे लगाने में सबसे आगे रहती हो, मगर जब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर ये निर्माण ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं, तब तुम कहीं गायब हो जाती हो।

कैसी भावना हो तुम! जो पालतू जानवरों के प्रति क्रूरता पर तो आंदोलनों में उतर आती हो, मगर सड़कों पर आवारा पशुओं की दुर्दशा पर तुम्हारी संवेदनाएं मर जाती हैं। कैसी भावना हो तुम! जो रेल के ‘जनरल’ डिब्बे की अमानवीय भीड़ में पिसते और दम तोड़ते आम लोगों को तो नहीं देख पातीं, मगर लग्जरी ट्रेनों के उद्घाटन के फीते काटते समय तुम सबसे आगे होती हो।

कैसी भावना हो तुम! जो सेलिब्रिटी की निजी तस्वीरों के लीक होने पर तो ‘निजता’ का शोर मचाती हो, मगर आम नागरिकों के फोन टैपिंग और सर्विलांस के नाम पर तुम खामोश हो जाती हो। कैसी भावना हो तुम! जो एक खिलाड़ी के मैच जीतने पर उसे देशभक्ति से जोड़ने लगती हो, मगर जब अन्य खेलों से जुड़े खिलाड़ी किसी सामाजिक अन्याय या मूलभूत सुविधाओं की बात करते हैं, तो तुम्हारे मुंह में दही जम जाता है।

कैसी भावना हो तुम! जो पटाखों के धुएं को त्यौहारों की अनिवार्य परंपरा से जोड़ देती हो, मगर तुम्हें जहरीली हवा में दम तोड़ते बच्चे और वे परिवार नहीं दिखते जिनकी सांसें प्रदूषण के कारण उखड़ रही हैं। कैसी भावना हो तुम! जिसे धर्म का चश्मा तो लगा है, लेकिन तुम उन जीवनदायिनी गंगा और यमुना की दुर्दशा नहीं देख पातीं, जो इतनी प्रदूषित हो चुकी हैं कि उनका पानी पीकर आज कोई भी मौत के मुंह में समा सकता है।

कैसी भावना हो तुम! जो इन दोहरे मापदंडों और निजी स्वार्थ की अंधी दौड़ में शामिल हो, और अवसरवादी विचारधारा के साथ सिर्फ हवा के रुख में बहना जानती हो। कैसी भावना हो तुम! जो धर्म के प्रति इतनी अंधी हो चुकी हो कि तुम्हें मानवता और इंसान का दर्द नजर ही नहीं आता। प्रिय भावना, अगर तुम! भड़कती हो तो जरूर भड़का करो, लेकिन उन मुद्दों पर भी भड़का करो जिनसे सिर्फ तुम्हारा भला न छुपा हो, बल्कि आम जनता का भी भला हो।

विपुल जोशी

नोट- यह पत्र विपुल जोशी ने हमें लिख भेजा है। विपुल; डायरेक्टर, कंटेंट राइटर, ज्योतिष जिज्ञासु होने के साथ ही वर्तमान में एसएसजे यूनिवर्सिटी अल्मोड़ा से एलएलबी की पढ़ाई कर रहे हैं। फक्कड़ स्वभाव वाले विपुल की ज्योतिष, कविता, आजाद ख्याल, और मनोविज्ञान पर कुल 7 किताबें छप चुकी हैं। एक किताब का अनुवाद अंग्रेजी में भी हुआ है। इनमें से तीन किताबें पेपरबैक में हैं जबकि अन्य के किंडल एडिशन आए हैं।

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